जातिवाद पर पर व्यंग्य करती परसाईजी की लेखनी.

अगस्त 15, 2007

हरिशंकर परसाई ने व्यंग्य विधा में अनूठे रंग बिखेरे और व्यवस्था,परिवेश और मनुष्य के स्तर पर नज़र आती तमाम बुराइयों पर अपने क़लम से फ़टकार लगाई.साठ साल के आज़ाद भारत की तस्वीर आज कितनी भी उजली नज़र आती हो..औरत,संप्रदाय,जाति,अशिक्षा,धर्म और छुआछूत के नाम पर स्थितियों में कोई ख़ास फ़र्क नहीं आया है.एक लघु कथा के ज़रिये परसाईजी ने कितने बेहतरीन नोट पर अपनी बात को ख़त्म किया आइये पढ़ते हैं….

जाति

कारख़ाना खुला.कर्मचारियों के लिये बस्ती बन गई.

ठाकुरपुरा से ठाकुर साहब और ब्राह्मणपुरा से पंडितजी कारखा़ने में नौकरी करने लगे और पास-पास के ब्लाँक में रहने लगे.

ठाकुर साहब का लड़का और पंडितजी की लड़की दोनो जवान थे.उनमें पहचान हुई और पहचान इतनी बढ़ी कि दोनों ने शादी करने का निश्चय किया.

जब प्रस्ताव आया तो पंडितजी ने कहा…ऐसा कभी हो सकता है भला ? ब्राह्मण की लड़की ठाकुर से शादी करे ! जाति चली जाएगी.

ठाकुर साहब ने भी कहा कि ऐसा नहीं हो सकता.पर-जाति में शादी  करने से हमारी जाति चली जाएगी.

किसी ने उन्हें समझाया कि लड़का – लड़की बड़े हैं ..पढ़े-लिखे हैं..समझदार हैं..उन्हें शादी कर लेने दो.अगर शादी नहीं की तो भी वे चोरी छिपे मिलेंगे और तब जो उनका संबंध होगा वह व्यभिचार कहलाएगा…

इस पर ठाकुर साहब और पंडितजी एक स्वर में बोले…

होने दो.व्यभिचार से जाति नहीं जाती है ; शादी से जाती है.


पं.रामनारायण उपाध्याय की सात्विक पंक्तियाँ

जुलाई 18, 2007

म.प्र. के साहित्य लेखन के गाँधी दादा रामनारायण उपाध्याय सरल,सहज और सात्विक क़लम के कारीगर थे.पं.माखनलाल चतुर्वेदी के खण्डवा के रामा दादा जीवनभर गाँधीवादी सोच में जीते रहे और वैसा ही लिखते रहे.बापू के कहने पर ग्रामीण अंचल में रह कर साहित्य सेवा करने वाले रामा दादा म.प्र.के वरिष्ठ लेखकों की जमात में पहली पायदान के हस्ताक्षर थे.निबंध,कहानी और अपनी छोटी छोटी कविताओं के ज़रिये मानो वे पूरे भारत में बसे ग्रामीण परिवेश का इकतारा बजाते थे.उनकी बहुचर्चित पुस्तक ’गँवई मन और गाँव की याद’ में रचे गए निबंध..मेरे गाँवों की सुख-शांति किसने छीन ली..से संकलित की हैं ये अमृत पंक्तियाँ…

आख़िर गाँवों का सुख और शांति किसने छीन ली ?

किसान के कंठ के गीत कहाँ लुप्त हो गए ? तीज-त्योहार की मस्ती किसने चुरा ली ; दही बिलोने वाली के थिरकन पर अब किसी किसन कन्हैया का मन क्यों नहीं नाचता ? सूरज की पहली किरण अब ग्वाले के हाथ लकुटी क्यों नहीं बनती ? उगता सूरज , अब किसी हल जोतने वाले के मन में अपनी प्रिया के भाल पर लगे कुमकुम की याद क्यों नहीं जगाता ? रात का चाँद अब किसी नववधू की देह मेम अपने प्रियतम की याद का ताबीज़ बनकर क्यों नहीं चुभता?

 किसी घर में लड़की का ब्याह रचाया जाता तो गीत की कड़ियों से हर सुहावने प्रभात और संध्या का स्वागत किया जाता,किसी गीत की अंगुली पकड़कर गणेशजी लड़की वाले का पता पूछते-पूछते विवाह घर आते और एक बुज़ुर्ग की तरह सारे कामों को निर्विघ्न सम्पन्न करवा कर ही लौटते…

 लड़की की बिदाई पर पिता के रोने से गंगा में बाढ़ आ जाती.माँ के रोने से आकाश में अंधेरा छा जाता और भाई के रोने से उसकी धोती पाँवों तक भीग जाती.ब्याह के मांगलिक गीतों में मानसरोवर की तरह पिता,भरे पूरे भण्डार की तरह ससुर,बहती गंगा की तरह माँ भरी पूरी बावडी़ ती तरह सास, गुलाब के फूल की तरह बच्चे और उगते सूर्य की तरह स्वामी के रूप में ऐसी उद्दात्त कल्पनाएँ सँजोई हैं , जिनको लेकर,हमारा पारिवारिक जीवन समॄध्द होता आया है.

 लेकिन अब…..वे गोकुल से सहज , सरल गाँव नष्ट ही होते जा रहे हैं जहाँ स्त्रियाँ बडे भोर में उठकर आटे के साथ घने अंधेरे को भी पीसकर सुहावने प्रभात में बदल देतीं थीं.जहाँ घट्टी के हर फ़ेरे के साथ गीत की नई पंक्तियाँ उठतीं थीं.लगता था जैसी श्रम में से संगीत का जन्म हो रहा है.

 अब फ़्लोअर मिल के साथ घर की घट्टी के गीत समाप्त होते जा रहे हैं .ट्रेक्टर के साथ हल के गीतों का लोप होता जा रहा है.खेत के घास तो तो हल की नोक से भी उखाड़कर फ़ेंका जा सकता है लिकिन ट्रेक्टर की गहरी जुताई के साथ जिस हल्की और ओछी सभ्यता के बीज बोये जा रहे हैं उन्हें उखाड़ फ़ैकने में कितना समय लगेगा, यह सोचकर ह्र्दय काँ उठता है.

मन सोचने पर मजबूर हो जाता है कि खरा परिवेश त्याग कर ये जो सिंथेटिक ज़िंदगी ओढ़ ली है हमने क्या वह वाक़ई हमारे काम की है…परिवेश से परे एक पावन परिवार की कल्पना बेमानी लगती है और दादा रामनारायण की का यह शब्द चित्र मन को बेधता है.


क्या कुछ भी तुम्हे अब आमंत्रित नहीं करते ?

जुलाई 12, 2007

यदि बन सको तो बनो

पर्वतों की भाँति औघड़

नदियों की भाँति पारदर्शी

और आदिम हवाओं की भाँति अनागरिक

धरती के काव्य-संकलन जैसे

ये वन,उपवन,पर्वत

साम्राग्यियों के चीनांशुकों से

ये धनखेत

कृष्ण-आकुल गोपिका नेत्रों जैसे

ये श्यामल मेघ

क्या कुछ भी तुम्हें अब आमंत्रित नहीं करते ?

-श्रीनरेश मेहता


भवानी भाई की प्रेरक – पंक्तियाँ

जुलाई 10, 2007

साधारणत: मौन अच्छा है…

किन्तु मनन के लिये !

जब शोर हो चारों ओर, सत्य के हनन के लिये !

 तब तुम्हे अपनी बात,

ज्वलंत शब्दों में कहना चाहिये !

 सिर कटाना पडे़ या न पडे़

तैयारी तो उसकी होनी चाहिये.


आइना झूठ बोलता ही नहीं

जुलाई 1, 2007

कृष्णबिहारी नूर फ़रमाते हैं…

ज़िन्दगी से बडी़ सज़ा ही नहीं

और क्या जुर्म है पता ही नहीं

सच घटे या बढे़ तो सच न रहे

झूठ की कोई इंतहा ही नहीं

चाहे सोने के फ़्रेम मे जड़ दो

आइना झूठ बोलता ही नहीं


आपके ह्र्दय-द्वार पर….दिनकर सोनवलकर

जुलाई 1, 2007

न जाने क्या बात है कि हमारा मालवा अपनी गुदड़ी के लालों को वह मान देता ही नहीं जिसके वो अधिकारी होते हैं.ऐसे ही एक सु-कवि दिनकर सोनवलकर आज भाषा-संवाद की जाजम पधारे हैं दिनकर जी ने हिन्दी ग़ज़ल पर भी लाजवाब काम किया है (जिसे नीरज जी गीतिका कहते हैं )मराठी के यशस्वी कवियों के अनुवाद भी दिनकर जी ने किये है.कुछ बेहतरीन गीन आकाशवाणी इन्दौर से प्रसारित हुए हैं.दो रचनाएं पढ़िये और महसूस कीजिये इस विलक्षण क़लमकार कारीगरी को.ये रचनाएं १९७० यानी अब से ३७ बरस पहले हिन्दी की आदरणीय पत्रिका वीणा में प्रकाशित हुईं थीं…दिनकर सोनवलकर…

एक सूचना…

कला के इस मंदिर में

झुककर प्रवेश कर.

इसलिये नहीं कि

प्रवेशद्वार छोटा है ?

और तेरी ऊँचाई से

टकरा कर टूट जाएगा .

नहीं !

आकाश ही उसका द्वार है…विराट

यहाँ बौने ही लगेंगे तेरे ठाठ-बाट.

इंसानियत के आगे झुकना

सबसे बडी़ कला है

उन्ही को कर प्रणाम

इसी में छुपे हैं….

रहीम और राम.

परंपरा बोध…..

मुझे क्या ज़रूरत है

विदेशी स्टंटों से चमकृत होने की ?

जिसकी हों अपनी जड़ें,वही औरों के भरोसे जिये.

क्या बताएगा गिन्सबर्ग मुझ कबीर पंथी को ?

पहले कह गया है गुरू हमारा

जो घर फ़ूँके आपनो सो चले हमारे साथ

तुम पहनो अपने तन पर

उधार ली हुई फ़ाँरेनमेड पोषाकें

हम तो जन्म से ही नंगे हैं..नंगे अवधूत

मर्लिन मूनरो या मारिज़ुआना

दोनों हदों से बेहद हो चुके हैं हम .

‘हम न मरिहै संसारा’

बीटनिक,बीटल्स या हिप्पी,सभी हैं माया का पसारा.

इस ठगिनी को खू़ब जानते हैं हम .

तुम नये जीवन-दर्शन के नाम पर

बडी़ पुरानी विकृतियों को उछालत हो

रचते रहो आँप या पाँप

हम तो बस चुपचाप

ज्यों की त्यों धर देते हैं चदरिया

विद्रोह को पतिक्षणं जीते हुए !


मेरे दोहे

जुलाई 1, 2007

कविता मेरा इलाक़ा नहीं लेकिन विरासत में मिला संस्कार है.अनुभूति या अनुभव के स्तर पर कभी कभी कुछ भाव उमड़ते हैं वैसे ही जैसे बिन मौसम बादल बरसते हैं.मेरा मानना है कि हर व्यक्ति के मन में संगीत और कविता का अंडर-करंट होता है और वक़्त-बेवक़्त वह अभिव्यक्त हो ही जाता है.कविता-गीत-संगीत मुझे विरसे में वैसे ही मिले हैं जैसे मुझे मेरा जिस्म और ख़ून.और इसलिये यदि किसी पंक्ति पर यदि आपकी दाद मिलेगी तो पूरी ईमानदारी से मै उसे  मेरे बाप-दादाओं की यश की बही में लिख देना चाहूंगा.मुलाहिज़ा फ़रमाएं

अहंकार से मन भरमाया

वाणी दूषित रोगी काया.

 

दुर्लभ जन्म मिला मानव का

इसको क्यों फ़िर क्षुद्र बनाया.

 

निहित स्वार्थ में जिया है जीवन

दृष्टी -वृत्ति मन कैसा पाया.

 

क्षण क्षण कितने हुए निरर्थक

अर्थ न जाना व्यर्थ कमाया.

 

स्वीकारो श्रद्धा-अनुनय यह

प्रेम-दान दो शीतल छाया.

 

क्षमा-पात्र यह द्वार तुम्हारे

एक अकिंचन लेकर आया.

संजय पटेल


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