ज़िन्दगी की सचाइयां बयान करते मुक्तक

June 23, 2007

आज ये मुक्तक लाया हूं बुज़ुर्ग शायर जनाब एस.एन.रूपायन के मजमुए ‘ टुकडे़ टुकडे़ हयात ‘से.

रूपायन साहब लाहौर के नामचीन एस.वी.काँलेज में पढे़ हैं और उर्दू के ऐसे शायरों में उनका ना बाइज़्ज़्त शुमार किया जा सकता है जिन्होने बहुत एकांत में रह कर ज़ुबान और अदब की ख़िदमत की है.पचास साला पुरानी किताबों की दुकान रूपायना ने इन्दौर शहर के लिट्रेचर और पुस्तक प्रेमियों को बहुत कुछ दिया है.रूपायन साहब अब अस्सी पार हैं और थक चले हैं.उनकी पत्नी श्रीमती लीला रूपायन जानी मानी कहानीकार हैं.रूपायन दंपत्ति की असली कमाई है इन्दौर के बडी़-छोटी उम्र के साहित्यप्रेमियों का स्नेह.रूपायन साहब की ज़िन्दगी का एक और पहलू है और वह यह कि वे हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के गहरे जानकार हैं और आकाशवाणी के प्रतिष्ठापूर्ण दौर में आँडिशन कमेटी के गणमान्य सदस्य रहे हैं.सादा तबियत रूपायन साहब हमेशा प्रचार और प्रशस्ति से कोसों दूर रहे हैं.उर्दू साहित्य की लोकप्रिय विधा मुक्तक पर रूपायन साहब का कारनामा रेखांकित करने योग्य है.वे चार पंक्तियों में पूरी एक ग़ज़ल का मर्म अपनी बात में कहने का हुनर रखते हैं रूपायन साहब. आज भाषा-संवाद मे उनके चंद मुक्तक ज़िन्दगी की सचाइयों को बयान कर रहे हैं .आपसे रूबरू हैं…जनाब एस.एन.रूपायन :

गै़र की बातों को छोडो़ गैर पर
दोस्तो ! खु़द से वफ़ादारी करो
जीना मुश्किल है मगर हर हाल में
हँस के जीने की अदाकारी करो.

ज़िन्दगानी की ओढ़नी पर जो
टांक रक्खे हैं हमने गुल-बूटे
फूल पत्ते ही इन को मत समझो
ये तो हैं छोटे-छोटे समझौते.

जिसकी है जैसी तमन्ना लिक्खो
और क्या उसको मिलेगा लिक्खो
जिनको आता नहीं जीने का हुनर
उनके हिस्से में निराशा लिक्खो.

टूटता हूँ न मै बिखरता हूँ
फ़ैलता हूँ फ़कत सदा बनकर
जब ज़माना मुझे सताता है
मै सिमट जाता हूँ दुआ बन कर.

रास्तों में उलझ न जाह कहीं
छोड़ कर घर को इतनी दूर न जा
नये रिश्ते तो बनते रहते हैं
जो पुराने हैं टूटने से बचा.

धूप शिद्द्त की है तो इसको मैं
सह न पाउंगा ये सवाल नहीं
लेकिन इस बात की है फ़िक्र मुझे
मेरा साया झुलस न जाए कहीं

पाप और पुण्य की लडा़ई में
कौन हारा है कौन जीत गया
सोचते सोचते यही आखि़र
ज़िन्दगी तेरा वक़्त बीत गया.


सुमनजी के मालवा का एक गुमनाम शायर…रमेश मेहबूब.

June 17, 2007

वक़्त भी बडा़ बेरहम है.किसी को बिन मांगे देता है ..कुछ ऐसे भी होते हैं जिन्हें अपना सर्वस्व देने के बाद भी कुछ नहीं मिलता.कला के क्षेत्र में तो ये बात ज़रा ज़्यादा ही लागू होती है.आज आपकी मुलाक़ात करवा रहा हूं मेरे शहर इन्दौर के वरिष्ठ कवि-शायर श्री रमेश मेहबूब से.नगर पालिक निगम इन्दौरे में टायपिस्ट रह चुके मेहबूबजी इन-दिनों बीमार रहते हैं ..पत्नी का देहांत हो चुका है और एकमात्र बेटी अपने ससुराल में व्यस्त रहती है… अपने परिवार और संसार की सुध लेने मे. रमेश मेहबूब ने छंद-बद्ध और अतुकांत कविताएं खू़ब लिखीं हैं.व्यंग्य  भी उनके काव्य में मुखर होता रहा है.राजनीति पर उनकी कविताओं में  व्यवस्था के खि़लाफ़ व्यंग्य बहुत  तीखा़ और चुभने वाला होता है.मालवा  के जिन कवियों  ने अपने क़लम से सक्रिय काव्य सेवा की है उनमें बालकवि बैरागी , सरोजकुमार,नरहरि पटेल,चंद्रसेन विराट,सत्यनारायण सत्तन,राहत इन्दौरी,क़ाशिफ़ इन्दौरी,नूर इन्दौरी,चन्द्रकांत देवताले के साथ रमेश मेहबूब का नाम भी इस  फ़ेहरिस्त में इज़्ज़त के साथ शुमार किया जा सकता है . मेहबूब जी की अनेक लाजवाब कविताएं हैं लेकिन आज मै आपके लिये उनकी  एक ग़ज़ल  ढूंढ निकाल लाया हूं.प्रयास करूंगा कि रमेश मेहबूब से संपर्क कर आपके लिये और रचनाएं जारी कर सकूं.अपनी बात ख़त्म करते हुए मै यह ज़रूर कहना चाहूंगा कि वक़्त रहते हमें अपने - अपने अंचल के काव्य और साहित्यकारों का दस्तावेज़ीकरण ज़रूर कर लेना चाहिये . डाँ.शिवमंगल सिंह सुमन के मालवा का यह यशस्वी कवि आज  अभाव और एकांत  से घिरा हुआ है लेकिन मेहबूब जी ने जो भी लिखा है वह अदभुत है.बस पुराने और मेहबूब जी जैसे लोगों के साथ एक ही बात है कि इन लोगों को कभी अच्छा प्रमोटर नहीं मिला अन्यथा वरिष्ठ कवि नीरज,माया गोविंद,सोम ठाकुर,काका हाथरसी,निर्भय हाथरसी,देवराज दिनेश और वीरेन्द्र मिश्र जैसे नामचीन कवियों के साथ काव्य-पाठ कर चुके रमेश मेहबूब का नाम आज देश के शीर्षस्थ कवियों में सम्मिलित किया जा सकता.

खै़र ये सब तो हमारे सोचने का नज़रिया है..मेहबूब अपने काव्य-कर्म से संतुष्ट हैं और उन्हे जितना भी नाम,यश और प्रेम मिला उसके लिये वे श्रोताओं सलाम करते हैं..

तो आइये मुलाहिज़ा फ़रमाइये..

रमेश मेहबूब की  ग़ज़ल..

 साज़िशें लड़वाने वालीं,दीनों-ईमां हो गईं

गीत हिन्दू हो गए,ग़ज़लें मुसलमां हो गईं

जब सियासत मज़हबों  की पालकी लेकर चली

मंदिर-ओ-मस्ज़िद की दीवारें पशेमां हो गईं

शहर में दंगे हुए,बाज़ार से उट्ठा धुआँ

शहर की गलियाँ सभी,आतिश-बदामाँ हो गईं

गुमशुदा लोगों में शामिल हो गईं अपनी भी नींद

ख्वा़ब हैराँ हो गए,रातें परेशाँ हो गईं

गीत भी मेहबूब के होठों पे अब आते नहीं

बेज़ुबाँ ग़ज़लें सभी अश्कों में पिनहाँ हो गईं


प्रेम करने के लिये समय निकालें

June 15, 2007

जीवन और चिंतन को उर्जा से भर देने वाली एक आयरिश कविता आपके साथ बांट रहा हूं.

वक़्त अपनी रफ़्तार से आगे जा रहा है.हमें इस बात का अहसास होना चाहिये कि सिर्फ़ वक़्त ही नहीं बीत रहा उसके साथ हम भी बीत रहे हैं. ये कविता हमारे सीमित समय में से बहुत कुछ असीमित और अपने लिये करने को प्रेरित करती है.ये भी सनद रहे कि लिखा तो सब अच्छा ही जा रहा है ..या गया है….पढा़ भी अच्छा जा रहा है …लेकिन क्षमा करें मनन और आचरण के स्तर पर हमसे बड़ा हिप्पोक्रेट न मिलेगा (जी… मैं भी शामिल हूं इसमें)

शब्द संपदा तो एक सुरभि बन कर हमारे पास आते हैं , किताबों,ब्लाग्स,पत्रिकाओं या बुज़ुर्गों की सीख से रूप में ..लेकिन हम ही शायद चूक जाते हैं उस गंध का आनन्द लेने से. मै निराशवादी नहीं हूं..क्योंकि उम्मीद पर ही तो टिकी है सारी दुनिया..चलिये इसी कविता के साथ जीवन में एक नए,सुरीले,चैतन्य सोच को विकसित करने का प्रयास तो किया ही जा सकता है .आइये पढिये ये आइरिश कविता…..

काम के लिये समय निकालें

यह सफलता का मूल्य है.

 

चिंतन के लिये समय निकालें

यह शक्ति का स्त्रोत है

 

खेल के लिये समय निकालें

यह अक्षय यौवन का रहस्य है

 

अध्ययन के लिये समय निकालें

यह आनंद का मार्ग है

 

स्वप्नों के लिये समय निकालें

यह उत्कर्ष का पहला क़दम है

 

प्रेम करने के लिये समय निकालें

यह दिव्यता की अनुभूति है

 

अपने चहुँओर देखने के लिये समय निकालें

स्वार्थों के लिये दिन बहुत छोटा है

 

उल्लास के लिये समय निकालें

यह आत्मा का संगीत है.

 

यह आइरिश कविता पढ़ने के बाद आपके आगामी दिन सुदिन बीतें.

हां एक गुज़ारिश …आपको वाक़ई लगे कि इन शब्दों में सकारात्मक संदेश हैं 

 तो और मित्रों और परिजनों के बीच इन शब्दों को संक्रामक बनाएं.खा़सकर नौजवानों में.वे ही हमारी उम्मीद हैं ..उन्हीं से हमें आस है..वे हमारा विश्वास हैं

टीप : कवि का नाम मैं ढूंढ रहा हूं कई दिनों से…इसमें आपकी मदद का स्वागत है.


ऐसा लगता है कोई मुझसे बड़ा है मुझमें

June 15, 2007

आग है,पानी है मिट्टी है,हवा है मुझमें

और फ़िर मानना पड़ता है खु़दा है मुझमें

 

जितने मौसम हैं सब जैसे कहीं मिल जाएं

इन दिनों कैसे बताऊं जो फ़ज़ां है मुझमें

 

टोक देता है क़दम जब भी ग़लत उठता है

ऐसा लगता है कोई मुझसे बडा़ है मुझमें

 

आईना ये तो बताता है मैं क्या हूं लेकिन

आईना इस पे है खा़मोश कि क्या है मुझमें

 

अब तो बस जान ही देने की  है बारी से  नूर

मै कहां तक करूं साबित कि वफ़ा है मुझमें

ये ग़ज़ल अर्से से मेरे संकलन में दस्तेयाब थी.शायर हैं जनाब कृष्ण बिहारी ‘नूर’ मरहूम

एक आलातरीन शायर ; क्लासिकी दौर का  एक ऐसा नाम जिसके क़लाम में सादगी के साथ सूफ़ियाना ख़ूशबू का रंग सहज ही उपलब्ध  है.अभी कुछ बरस हुए दुनिया ए फ़ानी से रूख़सत हो गये नूर साहब .उनके जाने के ठीक कुछ दिन पहले मुलाक़ात का मौक़ा आया था…लेकिन जैसा कि होता है ये नहीं मालूम था कि ये आख़री है.ग़ज़लों और शायरी के नाम पर जब जो कुछ भी मन में आए ; परोसा जा रहा हो तब नूर साहब को पढ़ना एक तसल्ली ही नहीं देता बल्कि नसीहत भी करता कि ग़ज़ल में लिखे हुए के अलावा  बहुत कुछ ऐसा भी पोशीदा है जिससे लिखने वाले के मन की गहराई की थाह मिलती है.नूर साहब जिस पाये के शायर थे वहां से बहुत दूर तक एक खा़लीपन नज़र आता है…

संजय पटेल


गुरूदेव की वैश्विक प्रार्थना

June 15, 2007


 

देश की माटी देश का जल

हवा देश की देश के फल

सरस बनें प्रभु सरस बनें

 

देश के घर और देश घाट

देश के वन और देश के बाट

सरल बनें प्रभु सरल बनें

 

देश के तन और देश के मन

देश के घर के भाई बहन

विमल बनें प्रभु विमल बनें

अनुवाद देश के शीर्षस्थ कवि पं भवानीप्रसाद मिश्र ने किया है.



कहने से कुछ नहीं होगा…..बचाना ही पडे़गा…पानी

June 13, 2007

paani-ki-boond.jpgपानी को लेकर गुज़रे ज़माने में एक विशेष तरह की निश्विंतता हुआ करती थी.वजह यह थी कि पानी वापरने वाले,पानी को सहेजने के मामले में या अप्ने आसपास के तालाबों, कुंओं,और झीलों की सुध लेने के मामले में वैसा ही सरोकार रखते थे जैसा कि जीवन के अन्य क्षेत्रों में…जैसे की कारोबार,रिश्तों या परिवार या जीवन से जुडी़ दीगर स्वार्थ से संबधित बातों मे  मनुष्य रखता है.प्र्कृति, पर्यावरण और परिवेश जैसे परिवार का हिस्सा हुआ करता था.इधर कुछ बरसों में स्थितियां कुछ विपरीत हो गईं हैं.अब पानी,प्रकृति,निसर्ग,पर्यावरण के लिये अलग से चिंता करने की ज़रूरत आन पडी़ है.ऐसा क्यों हुआ यह सोचने पर समझ में आ जाता है कि हम प्रकृति का दोहन करने के मामले में इतने बेरहम हो गये कि हमें अंदाज़ ही नहीं रहा कि हम कितनी विपरीत परिस्थितियों को आमंत्रित कर रहे हैं दूसरों को दोष देने में तो हम हमेशा से माहिर ही रहे हैं.पानी की किल्लत के लिये या अल्पवर्षा के लिये भी हम प्रकृति के मत्थे मढ रहे हैं सारा दोष.हां हमारी फ़ितरत देखिये कि जिन चीज़ों के लिये हमें क़ीमत चुकानी पड़ती है उसमें तो हम पूरी सतर्कता बरतते हैं लेकिन मुफ़्त के माल यानी जैसे कि पानी के मामले में हम पूरी बेपरहवाही से काम लेते हैं.इस सव को स्वीकारने में कैसी शर्म कि पर्यावरण हमारी प्राथमिकता सूचि में है ही नहीं.बस यहीं से सारी समस्या की शुरूआत होती है.हम बेसुध होकर पेड़ काटते जा रहे हैं.प्रदूषण के मामले में हम अभी भी गंभीर नहीं हुए हैं.दूरदर्शन के डी.डी.न्यूज़ को देखकर अच्छा लगा कि उसने अपने समाचार में खेल,कारोबार,मौसम के साथ अब पर्यावरण को लेकर रोज़ विशेष समय देना प्रारंभ कर दिया है.चैनलों से प्रसारित छिछोरी ख़बरों के बीच पर्यावरण को खा़स जगह मिलना सुखद है.होना तो यह भी चाहिये कि विद्यालयीन स्तर पर प्रत्येक कक्षा में एक पाठ (हिन्दी/अंग्रेज़ी दोनो माध्यमों में)पर्यावरण या खा़सतौर पर पानी की बचत पर होना ही चाहिये.प्रतिदिन ख़बरें आ रहीं हैं कि गंगा या नर्मदा जैसी नदियों का जल स्तर घटता जा रहा है.यानी ख़तरे की घंटी तो बज ही चुकी है और हमें मानसिक रूप से इसके लिये तैयार भी रहना चाहिये क्योंकि ये सब हमारा ही किया कराया है.बरसात की आमद होने ही वाली है और दिखियेगा कि एक बार हम फ़िर बेफ़िक्री से बरसात का मज़ा लेते रहेंगे और..अच्छे मानसून की खुशिया मनात,मल्हार गाते भूल जाएंगे कि जल की बचत होनी ही चाहिये.वाटर री-चार्जिंग यानी जल-पुर्नभरण समय की मांग है और इसके लिये जन-सामान्य में जागरूकता बेहद ज़रूरी है…ग्रामीण और शहरी  दोनो क्षेत्रों में.पानी को लेकर विश्व-युध्द होंगे ऐसी हमारे पर्यावरणविदों के वक्तव्य भी हमें भयभीत नहीं करते.भगवान करे ऐसा ना ही हो लेकिन इतना तय है कि युध्द से बडा़ खतरा मनुष्य का पानी के लिये बेभान हो जाना है.इस ओर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो ध्यान रखिये पानी को लेकर आतंकवाद या आरक्षण से ज़्याद भीषण स्थितियां बन सकती हैं . पानी पर चर्चा करने से बेहतर है कि पानी के फ़िजूल खर्चा पर हो .

मज़ाक की बात नहीं है पर देखियेगा कि ऐसा भी समय आ सकता है कि बेटे का बाप लड़की का हाथ मांगते वक़्त अपने होने वाले समधी से कहे कि भाई साहब दहेज़ - वहेज़ तो रहने दीजिये..आप तो इतना बता दीजिये कि यदि यह संबंध होने के बाद हमारे घर में पानी की किल्ल्त हुई तो आप पानी का टेंकर भेज पाएंगे न..यदि हां तो रिश्ता पक्का समझिये…..

अब कहने से कुछ नहीं होगा…पानी बचाना ही होगा…

वरना हमें शायद पानी के संदर्भ में ये कहत हुए लोग मिल जाएं….

अब तो उतनी भी नहीं मिलती है ज़माने मे

जितनी हम छोड़ दिया करते थे पैमाने में.

 संजय पटेल

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