ऐसा लगता है कोई मुझसे बड़ा है मुझमें

आग है,पानी है मिट्टी है,हवा है मुझमें

और फ़िर मानना पड़ता है खु़दा है मुझमें

 

जितने मौसम हैं सब जैसे कहीं मिल जाएं

इन दिनों कैसे बताऊं जो फ़ज़ां है मुझमें

 

टोक देता है क़दम जब भी ग़लत उठता है

ऐसा लगता है कोई मुझसे बडा़ है मुझमें

 

आईना ये तो बताता है मैं क्या हूं लेकिन

आईना इस पे है खा़मोश कि क्या है मुझमें

 

अब तो बस जान ही देने की  है बारी से  नूर

मै कहां तक करूं साबित कि वफ़ा है मुझमें

ये ग़ज़ल अर्से से मेरे संकलन में दस्तेयाब थी.शायर हैं जनाब कृष्ण बिहारी ‘नूर’ मरहूम

एक आलातरीन शायर ; क्लासिकी दौर का  एक ऐसा नाम जिसके क़लाम में सादगी के साथ सूफ़ियाना ख़ूशबू का रंग सहज ही उपलब्ध  है.अभी कुछ बरस हुए दुनिया ए फ़ानी से रूख़सत हो गये नूर साहब .उनके जाने के ठीक कुछ दिन पहले मुलाक़ात का मौक़ा आया था…लेकिन जैसा कि होता है ये नहीं मालूम था कि ये आख़री है.ग़ज़लों और शायरी के नाम पर जब जो कुछ भी मन में आए ; परोसा जा रहा हो तब नूर साहब को पढ़ना एक तसल्ली ही नहीं देता बल्कि नसीहत भी करता कि ग़ज़ल में लिखे हुए के अलावा  बहुत कुछ ऐसा भी पोशीदा है जिससे लिखने वाले के मन की गहराई की थाह मिलती है.नूर साहब जिस पाये के शायर थे वहां से बहुत दूर तक एक खा़लीपन नज़र आता है…

संजय पटेल

One Response to “ऐसा लगता है कोई मुझसे बड़ा है मुझमें”

  1. ramadwivedi Says:

    Bahut sundar lagi ye pantiyaa… shaayar ko hamari or se badhaaI jaroor deejiyega…

    टोक देता है क़दम जब भी ग़लत उठता है

    ऐसा लगता है कोई मुझसे बडा़ है मुझमें

    अब तो बस जान ही देने की है बारी से नूर

    मै कहां तक करूं साबित कि वफ़ा है मुझमें

    Dr. Rama Dwivedi

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