क्या कुछ भी तुम्हे अब आमंत्रित नहीं करते ?

यदि बन सको तो बनो

पर्वतों की भाँति औघड़

नदियों की भाँति पारदर्शी

और आदिम हवाओं की भाँति अनागरिक

धरती के काव्य-संकलन जैसे

ये वन,उपवन,पर्वत

साम्राग्यियों के चीनांशुकों से

ये धनखेत

कृष्ण-आकुल गोपिका नेत्रों जैसे

ये श्यामल मेघ

क्या कुछ भी तुम्हें अब आमंत्रित नहीं करते ?

-श्रीनरेश मेहता

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