आइना झूठ बोलता ही नहीं

July 1, 2007

कृष्णबिहारी नूर फ़रमाते हैं…

ज़िन्दगी से बडी़ सज़ा ही नहीं

और क्या जुर्म है पता ही नहीं

सच घटे या बढे़ तो सच न रहे

झूठ की कोई इंतहा ही नहीं

चाहे सोने के फ़्रेम मे जड़ दो

आइना झूठ बोलता ही नहीं


ज़िन्दगी की सचाइयां बयान करते मुक्तक

June 23, 2007

आज ये मुक्तक लाया हूं बुज़ुर्ग शायर जनाब एस.एन.रूपायन के मजमुए ‘ टुकडे़ टुकडे़ हयात ‘से.

रूपायन साहब लाहौर के नामचीन एस.वी.काँलेज में पढे़ हैं और उर्दू के ऐसे शायरों में उनका ना बाइज़्ज़्त शुमार किया जा सकता है जिन्होने बहुत एकांत में रह कर ज़ुबान और अदब की ख़िदमत की है.पचास साला पुरानी किताबों की दुकान रूपायना ने इन्दौर शहर के लिट्रेचर और पुस्तक प्रेमियों को बहुत कुछ दिया है.रूपायन साहब अब अस्सी पार हैं और थक चले हैं.उनकी पत्नी श्रीमती लीला रूपायन जानी मानी कहानीकार हैं.रूपायन दंपत्ति की असली कमाई है इन्दौर के बडी़-छोटी उम्र के साहित्यप्रेमियों का स्नेह.रूपायन साहब की ज़िन्दगी का एक और पहलू है और वह यह कि वे हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के गहरे जानकार हैं और आकाशवाणी के प्रतिष्ठापूर्ण दौर में आँडिशन कमेटी के गणमान्य सदस्य रहे हैं.सादा तबियत रूपायन साहब हमेशा प्रचार और प्रशस्ति से कोसों दूर रहे हैं.उर्दू साहित्य की लोकप्रिय विधा मुक्तक पर रूपायन साहब का कारनामा रेखांकित करने योग्य है.वे चार पंक्तियों में पूरी एक ग़ज़ल का मर्म अपनी बात में कहने का हुनर रखते हैं रूपायन साहब. आज भाषा-संवाद मे उनके चंद मुक्तक ज़िन्दगी की सचाइयों को बयान कर रहे हैं .आपसे रूबरू हैं…जनाब एस.एन.रूपायन :

गै़र की बातों को छोडो़ गैर पर
दोस्तो ! खु़द से वफ़ादारी करो
जीना मुश्किल है मगर हर हाल में
हँस के जीने की अदाकारी करो.

ज़िन्दगानी की ओढ़नी पर जो
टांक रक्खे हैं हमने गुल-बूटे
फूल पत्ते ही इन को मत समझो
ये तो हैं छोटे-छोटे समझौते.

जिसकी है जैसी तमन्ना लिक्खो
और क्या उसको मिलेगा लिक्खो
जिनको आता नहीं जीने का हुनर
उनके हिस्से में निराशा लिक्खो.

टूटता हूँ न मै बिखरता हूँ
फ़ैलता हूँ फ़कत सदा बनकर
जब ज़माना मुझे सताता है
मै सिमट जाता हूँ दुआ बन कर.

रास्तों में उलझ न जाह कहीं
छोड़ कर घर को इतनी दूर न जा
नये रिश्ते तो बनते रहते हैं
जो पुराने हैं टूटने से बचा.

धूप शिद्द्त की है तो इसको मैं
सह न पाउंगा ये सवाल नहीं
लेकिन इस बात की है फ़िक्र मुझे
मेरा साया झुलस न जाए कहीं

पाप और पुण्य की लडा़ई में
कौन हारा है कौन जीत गया
सोचते सोचते यही आखि़र
ज़िन्दगी तेरा वक़्त बीत गया.


सुमनजी के मालवा का एक गुमनाम शायर…रमेश मेहबूब.

June 17, 2007

वक़्त भी बडा़ बेरहम है.किसी को बिन मांगे देता है ..कुछ ऐसे भी होते हैं जिन्हें अपना सर्वस्व देने के बाद भी कुछ नहीं मिलता.कला के क्षेत्र में तो ये बात ज़रा ज़्यादा ही लागू होती है.आज आपकी मुलाक़ात करवा रहा हूं मेरे शहर इन्दौर के वरिष्ठ कवि-शायर श्री रमेश मेहबूब से.नगर पालिक निगम इन्दौरे में टायपिस्ट रह चुके मेहबूबजी इन-दिनों बीमार रहते हैं ..पत्नी का देहांत हो चुका है और एकमात्र बेटी अपने ससुराल में व्यस्त रहती है… अपने परिवार और संसार की सुध लेने मे. रमेश मेहबूब ने छंद-बद्ध और अतुकांत कविताएं खू़ब लिखीं हैं.व्यंग्य  भी उनके काव्य में मुखर होता रहा है.राजनीति पर उनकी कविताओं में  व्यवस्था के खि़लाफ़ व्यंग्य बहुत  तीखा़ और चुभने वाला होता है.मालवा  के जिन कवियों  ने अपने क़लम से सक्रिय काव्य सेवा की है उनमें बालकवि बैरागी , सरोजकुमार,नरहरि पटेल,चंद्रसेन विराट,सत्यनारायण सत्तन,राहत इन्दौरी,क़ाशिफ़ इन्दौरी,नूर इन्दौरी,चन्द्रकांत देवताले के साथ रमेश मेहबूब का नाम भी इस  फ़ेहरिस्त में इज़्ज़त के साथ शुमार किया जा सकता है . मेहबूब जी की अनेक लाजवाब कविताएं हैं लेकिन आज मै आपके लिये उनकी  एक ग़ज़ल  ढूंढ निकाल लाया हूं.प्रयास करूंगा कि रमेश मेहबूब से संपर्क कर आपके लिये और रचनाएं जारी कर सकूं.अपनी बात ख़त्म करते हुए मै यह ज़रूर कहना चाहूंगा कि वक़्त रहते हमें अपने - अपने अंचल के काव्य और साहित्यकारों का दस्तावेज़ीकरण ज़रूर कर लेना चाहिये . डाँ.शिवमंगल सिंह सुमन के मालवा का यह यशस्वी कवि आज  अभाव और एकांत  से घिरा हुआ है लेकिन मेहबूब जी ने जो भी लिखा है वह अदभुत है.बस पुराने और मेहबूब जी जैसे लोगों के साथ एक ही बात है कि इन लोगों को कभी अच्छा प्रमोटर नहीं मिला अन्यथा वरिष्ठ कवि नीरज,माया गोविंद,सोम ठाकुर,काका हाथरसी,निर्भय हाथरसी,देवराज दिनेश और वीरेन्द्र मिश्र जैसे नामचीन कवियों के साथ काव्य-पाठ कर चुके रमेश मेहबूब का नाम आज देश के शीर्षस्थ कवियों में सम्मिलित किया जा सकता.

खै़र ये सब तो हमारे सोचने का नज़रिया है..मेहबूब अपने काव्य-कर्म से संतुष्ट हैं और उन्हे जितना भी नाम,यश और प्रेम मिला उसके लिये वे श्रोताओं सलाम करते हैं..

तो आइये मुलाहिज़ा फ़रमाइये..

रमेश मेहबूब की  ग़ज़ल..

 साज़िशें लड़वाने वालीं,दीनों-ईमां हो गईं

गीत हिन्दू हो गए,ग़ज़लें मुसलमां हो गईं

जब सियासत मज़हबों  की पालकी लेकर चली

मंदिर-ओ-मस्ज़िद की दीवारें पशेमां हो गईं

शहर में दंगे हुए,बाज़ार से उट्ठा धुआँ

शहर की गलियाँ सभी,आतिश-बदामाँ हो गईं

गुमशुदा लोगों में शामिल हो गईं अपनी भी नींद

ख्वा़ब हैराँ हो गए,रातें परेशाँ हो गईं

गीत भी मेहबूब के होठों पे अब आते नहीं

बेज़ुबाँ ग़ज़लें सभी अश्कों में पिनहाँ हो गईं


ऐसा लगता है कोई मुझसे बड़ा है मुझमें

June 15, 2007

आग है,पानी है मिट्टी है,हवा है मुझमें

और फ़िर मानना पड़ता है खु़दा है मुझमें

 

जितने मौसम हैं सब जैसे कहीं मिल जाएं

इन दिनों कैसे बताऊं जो फ़ज़ां है मुझमें

 

टोक देता है क़दम जब भी ग़लत उठता है

ऐसा लगता है कोई मुझसे बडा़ है मुझमें

 

आईना ये तो बताता है मैं क्या हूं लेकिन

आईना इस पे है खा़मोश कि क्या है मुझमें

 

अब तो बस जान ही देने की  है बारी से  नूर

मै कहां तक करूं साबित कि वफ़ा है मुझमें

ये ग़ज़ल अर्से से मेरे संकलन में दस्तेयाब थी.शायर हैं जनाब कृष्ण बिहारी ‘नूर’ मरहूम

एक आलातरीन शायर ; क्लासिकी दौर का  एक ऐसा नाम जिसके क़लाम में सादगी के साथ सूफ़ियाना ख़ूशबू का रंग सहज ही उपलब्ध  है.अभी कुछ बरस हुए दुनिया ए फ़ानी से रूख़सत हो गये नूर साहब .उनके जाने के ठीक कुछ दिन पहले मुलाक़ात का मौक़ा आया था…लेकिन जैसा कि होता है ये नहीं मालूम था कि ये आख़री है.ग़ज़लों और शायरी के नाम पर जब जो कुछ भी मन में आए ; परोसा जा रहा हो तब नूर साहब को पढ़ना एक तसल्ली ही नहीं देता बल्कि नसीहत भी करता कि ग़ज़ल में लिखे हुए के अलावा  बहुत कुछ ऐसा भी पोशीदा है जिससे लिखने वाले के मन की गहराई की थाह मिलती है.नूर साहब जिस पाये के शायर थे वहां से बहुत दूर तक एक खा़लीपन नज़र आता है…

संजय पटेल