ऐसा लगता है कोई मुझसे बड़ा है मुझमें

June 15, 2007

आग है,पानी है मिट्टी है,हवा है मुझमें

और फ़िर मानना पड़ता है खु़दा है मुझमें

 

जितने मौसम हैं सब जैसे कहीं मिल जाएं

इन दिनों कैसे बताऊं जो फ़ज़ां है मुझमें

 

टोक देता है क़दम जब भी ग़लत उठता है

ऐसा लगता है कोई मुझसे बडा़ है मुझमें

 

आईना ये तो बताता है मैं क्या हूं लेकिन

आईना इस पे है खा़मोश कि क्या है मुझमें

 

अब तो बस जान ही देने की  है बारी से  नूर

मै कहां तक करूं साबित कि वफ़ा है मुझमें

ये ग़ज़ल अर्से से मेरे संकलन में दस्तेयाब थी.शायर हैं जनाब कृष्ण बिहारी ‘नूर’ मरहूम

एक आलातरीन शायर ; क्लासिकी दौर का  एक ऐसा नाम जिसके क़लाम में सादगी के साथ सूफ़ियाना ख़ूशबू का रंग सहज ही उपलब्ध  है.अभी कुछ बरस हुए दुनिया ए फ़ानी से रूख़सत हो गये नूर साहब .उनके जाने के ठीक कुछ दिन पहले मुलाक़ात का मौक़ा आया था…लेकिन जैसा कि होता है ये नहीं मालूम था कि ये आख़री है.ग़ज़लों और शायरी के नाम पर जब जो कुछ भी मन में आए ; परोसा जा रहा हो तब नूर साहब को पढ़ना एक तसल्ली ही नहीं देता बल्कि नसीहत भी करता कि ग़ज़ल में लिखे हुए के अलावा  बहुत कुछ ऐसा भी पोशीदा है जिससे लिखने वाले के मन की गहराई की थाह मिलती है.नूर साहब जिस पाये के शायर थे वहां से बहुत दूर तक एक खा़लीपन नज़र आता है…

संजय पटेल


गुरूदेव की वैश्विक प्रार्थना

June 15, 2007


 

देश की माटी देश का जल

हवा देश की देश के फल

सरस बनें प्रभु सरस बनें

 

देश के घर और देश घाट

देश के वन और देश के बाट

सरल बनें प्रभु सरल बनें

 

देश के तन और देश के मन

देश के घर के भाई बहन

विमल बनें प्रभु विमल बनें

अनुवाद देश के शीर्षस्थ कवि पं भवानीप्रसाद मिश्र ने किया है.



कहने से कुछ नहीं होगा…..बचाना ही पडे़गा…पानी

June 13, 2007

paani-ki-boond.jpgपानी को लेकर गुज़रे ज़माने में एक विशेष तरह की निश्विंतता हुआ करती थी.वजह यह थी कि पानी वापरने वाले,पानी को सहेजने के मामले में या अप्ने आसपास के तालाबों, कुंओं,और झीलों की सुध लेने के मामले में वैसा ही सरोकार रखते थे जैसा कि जीवन के अन्य क्षेत्रों में…जैसे की कारोबार,रिश्तों या परिवार या जीवन से जुडी़ दीगर स्वार्थ से संबधित बातों मे  मनुष्य रखता है.प्र्कृति, पर्यावरण और परिवेश जैसे परिवार का हिस्सा हुआ करता था.इधर कुछ बरसों में स्थितियां कुछ विपरीत हो गईं हैं.अब पानी,प्रकृति,निसर्ग,पर्यावरण के लिये अलग से चिंता करने की ज़रूरत आन पडी़ है.ऐसा क्यों हुआ यह सोचने पर समझ में आ जाता है कि हम प्रकृति का दोहन करने के मामले में इतने बेरहम हो गये कि हमें अंदाज़ ही नहीं रहा कि हम कितनी विपरीत परिस्थितियों को आमंत्रित कर रहे हैं दूसरों को दोष देने में तो हम हमेशा से माहिर ही रहे हैं.पानी की किल्लत के लिये या अल्पवर्षा के लिये भी हम प्रकृति के मत्थे मढ रहे हैं सारा दोष.हां हमारी फ़ितरत देखिये कि जिन चीज़ों के लिये हमें क़ीमत चुकानी पड़ती है उसमें तो हम पूरी सतर्कता बरतते हैं लेकिन मुफ़्त के माल यानी जैसे कि पानी के मामले में हम पूरी बेपरहवाही से काम लेते हैं.इस सव को स्वीकारने में कैसी शर्म कि पर्यावरण हमारी प्राथमिकता सूचि में है ही नहीं.बस यहीं से सारी समस्या की शुरूआत होती है.हम बेसुध होकर पेड़ काटते जा रहे हैं.प्रदूषण के मामले में हम अभी भी गंभीर नहीं हुए हैं.दूरदर्शन के डी.डी.न्यूज़ को देखकर अच्छा लगा कि उसने अपने समाचार में खेल,कारोबार,मौसम के साथ अब पर्यावरण को लेकर रोज़ विशेष समय देना प्रारंभ कर दिया है.चैनलों से प्रसारित छिछोरी ख़बरों के बीच पर्यावरण को खा़स जगह मिलना सुखद है.होना तो यह भी चाहिये कि विद्यालयीन स्तर पर प्रत्येक कक्षा में एक पाठ (हिन्दी/अंग्रेज़ी दोनो माध्यमों में)पर्यावरण या खा़सतौर पर पानी की बचत पर होना ही चाहिये.प्रतिदिन ख़बरें आ रहीं हैं कि गंगा या नर्मदा जैसी नदियों का जल स्तर घटता जा रहा है.यानी ख़तरे की घंटी तो बज ही चुकी है और हमें मानसिक रूप से इसके लिये तैयार भी रहना चाहिये क्योंकि ये सब हमारा ही किया कराया है.बरसात की आमद होने ही वाली है और दिखियेगा कि एक बार हम फ़िर बेफ़िक्री से बरसात का मज़ा लेते रहेंगे और..अच्छे मानसून की खुशिया मनात,मल्हार गाते भूल जाएंगे कि जल की बचत होनी ही चाहिये.वाटर री-चार्जिंग यानी जल-पुर्नभरण समय की मांग है और इसके लिये जन-सामान्य में जागरूकता बेहद ज़रूरी है…ग्रामीण और शहरी  दोनो क्षेत्रों में.पानी को लेकर विश्व-युध्द होंगे ऐसी हमारे पर्यावरणविदों के वक्तव्य भी हमें भयभीत नहीं करते.भगवान करे ऐसा ना ही हो लेकिन इतना तय है कि युध्द से बडा़ खतरा मनुष्य का पानी के लिये बेभान हो जाना है.इस ओर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो ध्यान रखिये पानी को लेकर आतंकवाद या आरक्षण से ज़्याद भीषण स्थितियां बन सकती हैं . पानी पर चर्चा करने से बेहतर है कि पानी के फ़िजूल खर्चा पर हो .

मज़ाक की बात नहीं है पर देखियेगा कि ऐसा भी समय आ सकता है कि बेटे का बाप लड़की का हाथ मांगते वक़्त अपने होने वाले समधी से कहे कि भाई साहब दहेज़ - वहेज़ तो रहने दीजिये..आप तो इतना बता दीजिये कि यदि यह संबंध होने के बाद हमारे घर में पानी की किल्ल्त हुई तो आप पानी का टेंकर भेज पाएंगे न..यदि हां तो रिश्ता पक्का समझिये…..

अब कहने से कुछ नहीं होगा…पानी बचाना ही होगा…

वरना हमें शायद पानी के संदर्भ में ये कहत हुए लोग मिल जाएं….

अब तो उतनी भी नहीं मिलती है ज़माने मे

जितनी हम छोड़ दिया करते थे पैमाने में.

 संजय पटेल

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